आयुर्वेद-मूल अवधारणाएं

आयुर्वेद-मूल अवधारणाएं

प्राचीन काल से ही मनुष्य रोगों को दूर करने की कोशिश करता रहा है। ऋषि-मुनियों ने जड़ी बूटियों और सही जीवन शैली के आधार पर चिकित्सा प्रणाली विकसित की है आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेद) विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है।

आयुरस्मिन् विद्यते अनेन वा आयुर्विन्दतीत्यायुर्वेद:। (च.सू. १/१३)
अर्थात् जिसके द्वारा आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।

तदायुर्वेद यतीत्यायुर्वेद:। (चरक संहिता सूत्र. 30/23)
अर्थात् जो आयु का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहा जाता है।

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥ -(चरक संहिता १/४०)

(अर्थात जिस ग्रंथ में – हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःख आयु (रोग अवस्था) – इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।)

‘भावप्रकाश’ के टीकाकार भी ‘आयुर्वेद’ शब्द का इस प्रकार विशदीकरण करते हैं:

अनेन पुरुषो यस्माद् आयुर्विन्दति वेत्ति च ।
तस्मान्मुनिवरैरेष ‘आयुर्वेद’ इति स्मृतः ॥
हिताहितं सुखं दुःखं आयुस्तस्य हिताहितम् ।
मानं च तच्च यत्रोक्तं आयुर्वेदः स उच्यते ॥ च.सू.३.४१॥

अर्थात् हितायु, अहितायु, सुखायु एवं दुःखायु; इस प्रकार चतुर्विध जो आयु है उस आयु के हित तथा अहित अर्थात् पथ्य और अपथ्य आयु का प्रमाण एवं उस आयु का स्वरूप जिसमें कहा गया हो, वह आर्युवेद कहा जाता है।

आयुर्वेद, भारतीय आयुर्विज्ञान है। आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु बढ़ाने से है। ऋषियों ने कहा है ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्‌’ अर्थात्‌ यह शरीर ही धर्म का श्रेष्ठ साधन है। यदि हम धर्म में विश्वास रखते हैं और स्वयं को धार्मिक कहते हैं, तो अपने शरीर को स्वस्थ रखना हमारा पहला कर्तव्य है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, तो जीवन भारस्वरूप हो जाता है। यजुर्वेद में निरन्तर कर्मरत रहते हुए सौ वर्ष तक जीने का आदेश दिया गया है- ‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत्छतं समाः’ अर्थात्‌ ‘हे मनुष्य! इस संसार में कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा कर।’ 

वेदों में ईश्वर से प्रार्थना की गई है- 

‘पश्येम्‌ शरदः शतम्‌, जीवेम्‌ शरदः शतम्‌,
श्रुणुयाम्‌ शरदः शतम्‌, प्रब्रवाम्‌ शरदः
शतम्‌, अदीनः स्याम्‌ शरदः
शतम्‌, भूयश्च शरदः शतात्‌’ 
अर्थात्‌ ‘हम सौ वर्ष तक देखें, जिएं, सुनें, बोलें और आत्मनिर्भर रहें। (ईश्वर की कृपा से) हम सौ वर्ष से अधिक भी वैसे ही रहें।’

आयुर्वेद का प्रयोजन :


प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च।
“इस आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है।”

इस संदर्भ में आयुर्वेद का प्रयोजन सिद्ध करते हुए कहा गया है-

आयुः कामयमानेन धमार्थ सुखसाधनम् ।
आयुर्वेदोपदेशेषु विधेयः परमादरः (अ० सं० सू०-१/२)
        आयुर्वेद का अर्थ प्राचीन आचार्यों की व्याख्या और इसमें आए हुए ‘आयु’ और ‘वेद’ इन दो शब्दों के अर्थों के अनुसार बहुत व्यापक है। आयुर्वेद के अनुसार आयु चार प्रकार की होती है- हितायुः, अहितायुः, सुखायुः, दुःखायु। महर्षि चरक के ही अनुसार- इन्द्रिय, शरीर, मन और आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। धारि, जीवित, नित्यग, अनुबंध और चेतना-शक्ति का होना ये आयु के पर्याय हैं।


शरीरेन्दि्रयसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम् ।
नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्य्यायैरायुरुच्यते ॥ (च०सू० १/४२)
प्राचीन ऋषि मनीषियों ने आयुर्वेद को ‘शाश्वत’ कहा है और अपने इस कथन के समर्थन में तीन अकाट्य युक्तियां दी हैं यथा-

सोयेऽमायुर्वेद: शाश्वतो निर्दिश्यते,
अनादित्वात्, स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्, भावस्वभाव नित्यत्वाच्च। (चरक संहिता सूत्र, 30/26)
अर्थात् यह आयुर्वेद अनादि होने से, अपने लक्षण के स्वभावत: सिद्ध होने से, और भावों के स्वभाव के नित्य होने से शाश्वत यानी अनादि अनन्त है।

       आर्युवेद की मूल रचना संस्कृत में होने के कारण लोगों को आर्युवेद के मूल नियमों को समझने में काफी कठिनाई आ रही है। आयुर्वेदिक पद्धति से जुड़े दोष, गुण, रस और प्रकृति जैसे शब्द को लोग जानते तो हैं लेकिन इन शब्दों का सही अर्थ नहीं समझ पा रहे। इसलिए अब हमारा प्रयास है कि हम आपको अपने लेखों से आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को ठीक से समझाने का प्रयास कर रहे हैं। जिससे आपको आयुर्वेद से संबंधित संपूर्ण जानकारी अच्छी प्रकार समझ में आ सके।

आरोग्य तथा रोग :

धर्मार्थकाममोक्षाणाम् आरोग्यं मूलमुत्तमम् ।
रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च ॥ -चरकसंहिता सूत्रस्थानम् – १.१४
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल (जड़) उत्तम आरोग्य ही है। अर्थात् इन चारों की प्राप्ति हमें आरोग्य के बिना नहीं सम्भव है।
शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनम्
अर्थात् धर्म की सिद्धि में सर्वप्रथम, सर्वप्रमुख साधन (स्वस्थ) शरीर ही है। अर्थात् कुछ भी करना हो तो स्वस्थ शरीर पहली आवश्यकता है।

सत्त्वमात्मा शरीरं च भयमेतत्भिदण्डवत।”
लोकस्तिष्ठित संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।।” -चरक सू. अ. 7/46

चरक कहते हैं, ‘‘मन, आत्मा और शरीर ऐसे तीन स्तंभ हैं जिन पर न केवल मानव जाति का बल्कि विश्व का अस्तित्व टिका हुआ है।’’

(स्वस्थ) शरीर के तीन स्तम्भ :
त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।”
शरीररुपी मकान को धारण करनेवाले तीन स्तंभ हैं: आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य (गृहस्थाश्रम में सम्यक् कामभोग)।

ब्रह्म मुहूर्त में जागरण
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षार्थमायुषः॥ (भावप्रकाश 1/24)
अर्थात स्वस्थ मनुष्य अपनी आयु की रक्षा के लिये ब्रह्म मुहूर्त में उठे।
सुख की नींद
सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी ।
हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रिय: ॥
सत्य बोलनेवाला, मर्यादित व्यय करनेवाला, हितकारक पदार्थ आवश्यक प्रमाण मे खानेवाला, तथा जिसने इन्द्रियों पर विजय पाया है , वह चैन की नींद सोता है।

शरीर और मन :
शरीरं हि सत्त्वमनुविधीयते सत्त्वं च शरीरम्॥ (च.शा.४/३६)
रोगोत्पत्ति में शरीर और मन के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित करते हुए कहा है कि जैसा मन होगा वैसा शरीर तथा जैसा शरीर होगा वैसा मन।

इस शरीर में पंच ज्ञानेन्द्रिय एवं पंच कर्मेन्द्रियों को कार्यरत करने वाले मन की भी तीन प्रकृतियाँ होती हैं—सात्विक, राजस और तामस। इनमें सात्विक श्रेष्ठ है और राजस एवं तामस विकारयुक्त मानी गयी हैं। इसीलिए अष्टांग हृदय में कहा गया है- रजसः तमस्यः दौच दोषो उदादद्दो

रोग का कारण :

धी धृति स्मृति विभ्रष्ट: कर्मयत् कुरुत्ऽशुभम्।
प्रज्ञापराधं तं विद्यातं सर्वदोष प्रकोपणम्॥ (चरक संहिता शरीर. 1/102)
अर्थात् धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन अशुभ कर्मों को ‘प्रज्ञापराध’ कहा जाता है। जो प्रज्ञापराध करेगा उसके शरीर और स्वास्थ्य की हानि होगी और वह रोगग्रस्त हो ही जाएगा।
 
    आयुर्वेदिक पद्धति में चिकित्सा के समय चिकित्सक केवल रोग के लक्षणों को नहीं देखता किंतु आपके मन प्रकृति दोषों ( वात पित्त कफ ) और धातु की स्थिति का भी संम्पूर्ण ध्यान रखता है यही कारण होता है कि एक ही रोग से पीड़ित होने के कारण अलग-अलग मरीजों की प्रकृति और दोष के अनुसार उनकी दवाइयां अलग अलग होती हैं। इन दोषों को कैसे समझें?
            जब इलाज के लिए आप किसी वैध के पास जाते हैं तो वह आपको क्या है कि आपके शरीर में वात बढ़ गया है या पित्त बढ़ जाने के कारण आपको यह समस्या हो रही है लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि वह क्या कह रहे हैं। यह वात पित्त और कफ तीनों क्या है? और इनसे शरीर को क्या नुकसान है। आपको यह समझना  अवश्यक हैं। कि हमारा   शरीर जल, पृथ्वी, आकाश, अग्नि, और वायु से मिलकर बना है। इसी कारण  आयुर्वेद के अनुसार आपके  शरीर पर इनका  सबसे ज्यादा प्रभाव रहता है वात पित्त और कफ दोष भी इन्हीं  पांच तत्वों में  से  दो तत्वों के मिलने के आधार पर दोषों का निधार्रण  किया है। तीनों अगर शरीर में संतुलित अवस्था में है तो आप समझते हैं अगर इनमें से किसी एक का भी संतुलन बिगड़ गया तो रोग उत्पन्न होने लगते हैं इसी कारण से इन्हें दोष कहा गया है इन दोषों की संख्या तीन होने के कारण ही इन्हें त्रिदोष कहा गया है प्रत्येक दोष में ऊपर बताए गए पांच तत्वों में से दो तत्व होते हैं उन्हीं दो तत्वों के सभा के आधार पर इन दोषों के लक्ष्य निर्धारण किया हैं जैसे

 

वात दोष :-

आकाश और वायु इन दो तत्वों से मिलकर बना है। यह दोनों गतिशील है तो वात के लक्षण भी गति से जुड़े हैं । वात दोष को आयुर्वेद में शरीर के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना है आयुर्वेद के अनुसार जो तत्व शरीर में गति या उत्साह उत्पन्न करें उसे वात या वायु कहते हैं अब दूसरे तरीके से आप समझ सकते हैं कि इस संसार में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है यहां पर वायु ना हो उसी प्रकार इस शरीर में कोई भी स्थान ऐसा विद्यमान नहीं है। जहां पर वायु ना हो क्योंकि  शरीर के हर खाली स्थान पर वायु पाई जाती है और यह इतना प्रभावशाली है कि यह दूसरे दोषों को चाहे वह पित्त है या कफ है। उसको भी एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुंचा देता है। इसलिए इसका मानव शरीर पर सबसे ज्यादा प्रभाव रहता है। इसी के कारण शरीर से पसीना निकलता है, जो मल -मूत्र निकलने की प्रक्रिया उसकी भी अंदर से प्रधानता इसी की है। हम वायु के दबाव से ही मल और मूत्र को निकालते हैं। तो देखा जाए तो आयुर्वेद के अनुसार सभी रोगों का मूल कारण वात / वायु ही है और  जिस शरीर के अंदर वायु /वात दोष ज्यादा होता है उसी को वात प्रकृति वाला शरीर कहते है। पंच तत्वों में से एक प्रमुख तत्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखती है और जो श्वास के रूप में हमारा प्राण है।

पित्तः पंगुः कफः पंगुः पंगवो मलधातवः।
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेघवत्॥
पवनस्तेषु बलवान् विभागकरणान्मतः।
रजोगुणमयः सूक्ष्मः शीतो रूक्षो लघुश्चलः॥ (शांर्गधरसंहिताः 5.25-26)
पित्त, कफ, देह की अन्य धातुएँ तथा मल-ये सब पंगु हैं, अर्थात् ये सभी शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं नहीं जा सकते। इन्हें वायु ही जहाँ-तहाँ ले जाता है, जैसे आकाश में वायु बादलों को इधर-उधर ले जाता है। अतएव इन तीनों दोषों-वात, पित्त एवं कफ में वात (वायु) ही बलवान् है; क्योंकि वह सब धातु, मल आदि का विभाग करनेवाला और रजोगुण से युक्त सूक्ष्म, अर्थात् समस्त शरीर के सूक्ष्म छिद्रों में प्रवेश करनेवाला, शीतवीर्य, रूखा, हल्का और चंचल है।

पित्त दोष:-  पित्त दोष ‘अग्नि’ और ‘जल’इन दो तत्वों को मिलकर बना है। इसके कारण शरीर में गर्मी उत्पन्न होती हैं।   शरीर में अग्नि और जल का आपस में संतुलन है कि जैसे शरीर में कोई भी हम चीज खाते हैं तो उसको पचाने के लिए शरीर में अग्नि की आवश्यकता जरूरी है यानी जो भी हम खाद्य पदार्थ खाते हैं उसको पचाने के लिए अग्नि का होना जरूरी है अग्नि मंद हो गई तो पेट की बीमारी आ जाएगी।अगर  तेज हो गई तो वह हमारे शरीर के दोष (पीलिया आदि) उत्पन्न कर देती है  इसलिए इनका संतुलन होना बहुत जरूरी है जिस व्यक्ति के शरीर में अग्नि ज्यादा होगी तो उसको हम प्रकृति वाला कहेंगे।

कफ दोष :- कफ दोष ‘पृथ्वी’ और ‘जल’ इन दो तत्वों से मिलकर बना है। कफ दोष का महत्व क्रम पर तीसरे स्थान पर आता है। कफ ही शरीर के सभी अंगो का पोषण करता है यानी जब भी हम कोई खाद्य पदार्थ करते हैं वह जल के साथ मिलकर पहले वह कफ बनता है  यही कफ को पित्त के साथ यानी हमारी पाचक शक्ति जो अग्नि है पकाकर पूरे  शरीर के सभी अंगो का पोषण करता है और बाकी दोनों दोषों  को (वात और पित्त )को भी नियंत्रण करता है।हमारी मानसिक और शारीरिक काम करने की क्षमता सब इसी के कफ के ऊपर निर्भर है कफ भारी मुलायम और चिपचिपा होता है जिस व्यक्ति के शरीर में कफ दोष ज्यादा होता है वह कफ प्रकृति वाला कहलाता है।

 
इन दोषों के संतुलित होने के दो मुख्य कारण है। पहला इन देशों में बढ़ोतरी दूसरा इसमें कमी वैसे देखा जाए तो किसी को उसके बढ़ोतरी होने से रोग होते है। क्योंकि अगर दो स्वयं ही करनी कमी का कमी की अवस्था में है तो रोग उत्पन्न नहीं कर पाएंगे आपकी खराब जीवनशैली और गलत खान-पान से इसका प्रभाव बदलता रहता है। यही बीमारियों का मुख्य कारण है।
 
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ सुश्रुत संहिता में ऋषि ने लिखा है-

समदोषाः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥

अर्थात्‌ जिसके तीनों दोष (वात, पित्त एवं कफ) समान हों, जठराग्नि सम (न अधिक तीव्र,न अति मन्द) हो, शरीर को धारण करने वाली सात धातुएं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य) उचित अनुपात में हों, मल-मूत्र की क्रियाएं भली प्रकार होती हों और दसों इन्द्रियां (आंख, कान, नाक, त्वचा, रसना, हाथ, पैर, जिह्वा, गुदा और उपस्थ), मन और सबकी स्वामी आत्मा भी प्रसन्न हो, तो ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ कहा जाता है।
        ऐसे ही समझ सकते हैं कि आप जिस दोष के बढ़ने वाली चीजें ज्यादा खा रहे हैं तो आपको उस दोष से जुड़े रोग होने की ज्यादा संभावना बढ़ जाती है। यदि हमारे शरीर का निर्माण दोष धातु मल इन तीनों में हुआ रची काल से ही मनुष्य रोगों को दूर करने की कोशिश करता रहा है।

धातु :- 

धातुः धारणात् धातवः।

            जो शरीर को धारण करें उन्हें धातु कहते हैं। सुश्रुत के अनुसार मनुष्य जो पदार्थ खाता है, उससे पहले द्रव स्वरूप एक सूक्ष्म सार बनता है, जो रस कहलाता है। इसका स्थान ह्वदय कहा गया है। यहाँ से यह धमनियों द्वारा सारे शरीर में फैलता है। यही रस तेज के साथ मिलकर पहले रक्त का रूप धारण करता है और तब उससे मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि शेष धातुएँ बनती है।

मल:- 

मलः पृथक जन्मानः भावा मलाः।

         शरीर के जिन घटकों का शरीर को छोड़कर जाना ही उचित है, अन्यथा शरीर में एकत्रित होकर जो शरीर को मलिन कर देते हैं उन्हें मल कहा जाता है।अधोवात, शौच, मूत्र, पसीना, केश तथा नाक-कान-आँखों से निकलने वाले त्याज्य पदार्थ – ये मल हैं। मल शरीर से बाहर निकलकर शरीर को निर्मल बनाते हैं। अपने समान गुणवाले पदार्थों के सेवन से दोष धातु मलों की वृद्धि होती है व विरूद्ध गुणवाले पदार्थों के सेवन से इनकी कमी होती है। इन दोषों, धातुओं व मलों का सम होना स्वास्थ्य है व विषम होना ही रोग है। यथा – रोगस्तु धातुवैषम्यं, धातुसाम्यं अरोगता।

अग्नि :- शरीर की चयापचय और पाचन गतिविधि के सभी प्रकार शरीर की जैविक आग की मदद से होती हैं जिसे अग्नि कहा जाता है। अग्नि को आहार नली, यकृत तथा ऊतक कोशिकाओं में मौजूद एंजाइम के रूप में कहा जा सकता है।

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