चित्रक / Chitrak परिचय, गुण धर्म और औषधीय प्रयोग।

चित्रक / Chitrak परिचय, गुण धर्म और औषधीय प्रयोग।

चित्रक / Chitrak परिचय, गुण धर्म और औषधीय प्रयोग।

चित्रक (Chitrak Introduction)

चित्रक का पौधा (chitrak ka podha)एक झाड़ीदार पौधा (है जो मानव के लिए यह बहुत ही उपयोगी होता है। आयुर्वेद में इसके  गुणों  के बारे बताया गया है कि चित्रक का प्रयोग करके हम बहुत  सी बीमारियों को ठीक कर सकते है।
 चित्रक के पौधे, पत्तियां और जड़ों का प्रयोग भिन्न रोगो के उपचार के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग अनेक रोगों के रोकथाम तथा इलाज के लिए कर सकते है। इसकी तीन जातियां पाई जाती हैं, जो ये हैंः- सफेद चित्रक, लाल चित्रक और नीला चित्रक यह एक सीधा और लंबे समय तक हरा-भरा रहने वाला पौधा (chitrak plant) होता है। यह भारत के सभी स्थानों विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत के पर्णपाती यानी पतझड़ी और पथरीले वनों में तथा खाली पड़ी भूमि पर पाया जाता है। इसका तना कठोर, फैला हुआ, गोलाकार, सीधा तथा रोमरहित होता है। इसके पत्ते लगभग 3.8-7.5 सेमी तक लम्बे एवं 2.2-3.8 सेमी तक चौड़े होते हैं। इसके फूल नीले-बैंगनी अथवा हल्के सफेद रंग के होते हैं। आपने भी चित्रक के पौधे (chitrak plant) को अपने आसपास देखा हो लेकिन पहचान या जानकारी नहीं होने के कारण इसका लाभ नहीं ले पा रहे हों। इस जानकारी के बाद आप चित्रक का पूरा लाभ ले पाएंगे।
 

चित्रक (Chitrak)विभिन्न भाषाओं में नाम :- 

 चित्रक को कई नामों से जाना जाता है, जो ये हैंः-
सफेद चित्रक के नाम (Names of White Chitrak)Hindi – चीत, चीता, चित्रक, चित्ता, चितरक, चितउर
English – Ceylon leadwort (सिलोन लेडवर्ट), व्हाइट फ्लॉवर्ड लेडवर्ट (White flowered leadwort), व्हाइट लेडवर्ट (White leadwort)
तामिल- चित्रकम, कोदिवेली
मलयालम – वेल्लाकोटुवेरी , कोटुबेलि,
संस्कृति – चित्रक, अग्नि, अग्निमाता, ऊषण, पाठी, वह्नि संज्ञा
पंजाबी, मराठी – चित्रक 

चित्रक के औषधीय गुण / Chitrak Medicinal Properties 

साधारणतः चित्रक से सफेद चित्रक ही ग्रहण किया जाता है। सफेद चित्रक अग्निवर्धक, त्रिदोष नाशक, रसायन, पाचक, लघुपाकी (शीघ्र पचनेवाला), रुक्ष और उष्णवीर्य है। यह तीखा, कड़वा और भूख बढ़ाने वाला है, भोजन को पचाता है,पेट के कीड़ों को खत्म करता है,उल्टी को रोकता है, यह खून तथा माँ के दूध को शुद्ध करता है व सूजन को पचाता है। टॉयफायड बुखार, घावों, पेचिश, प्लीहा यानी तिल्ली की वृद्धि, अपच, कुष्ठ रोग, खुजली आदि विभिन्न चर्मरोगों, बुखार, मिर्गी, सूजन, दर्द, खांसी, श्वसनतंत्र, पुराना बुखार, सिफलिश को भी ठीक करता है। खून की कमी यानी एनीमिया, एक्जीमा, सफेद दाग, दाद तथा कुष्ठ रोग में भी लाभ पहुँचाता है।और मोटापा आदि को भी समाप्त करता है। गर्भाशय को बल देता है, कैंसररोधी यानी एंटीकैंसर तथा लीवर के घाव को ठीक करता है। चित्रक, वायविडंग और नागरमोथा इन तीनों औषधियों के समूह को ‘त्रिमद’ कहते है। इसका उपयोग अनेक औषधों में भूख बढ़ाने, शरीर में स्फूर्ति लाने और अजीर्ण को नष्ट करने के लिये होता है। चित्रक की प्रमाण से अधिक मात्रा लेने से यह विष (Toxin) की तरह शरीर में विकार पैदा करता है, इसलिये इसकी प्रमाण से अधिक मात्रा कभी भी नहीं लेनी चाहिये।

चित्रक विभिन्न रोगों में उपचार /Chitrak in Treatment of various diseases

नकसीर :- सफेद चित्रक के 2 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर खाने से नकसीर यानी नाक से खून आना बंद होता है। 500 मिग्रा लाल चित्रक के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर चाटने से नकसीर बन्द होती है।

सर्दी-खाँसी और जुकाम में :-5- 10 ग्राम चित्रकादि लेह को सुबह और शाम सेवन करने से खाँसी, दम फूलना, हृदय रोग में लाभ होता है।

  • हरड़, बहेड़ा, आँवला, गिलोय, चित्रक, रास्ना, विडंग, सोंठ, मरिच तथा पिप्पली का बराबर भाग मिलाकर चूर्ण बना लें। 2-4 ग्राम चूर्ण में मिश्री मिलाकर सेवन करने से खांसी में लाभ होता है।

सिर दर्द में :- नीले चित्रक की जड़ के चूर्ण को नाक से लेने से सिर दर्द में लाभ होता है।

दांतों के रोग में :- नीले चित्रक की जड़ तथा बीज के चूर्ण को दांतों पर मलने से पायोरिया (Pyorrhea) यानी दांतों से पीव आने की बीमारी ठीक होती है। इसके साथ ही दांत का घिसना-टूटना बंद होता है।

हदय शूल में :- चित्रक की छाल, पिपली, सोंठ, काली मिर्च और पीपला मूल सभी पांच 2-2 ग्राम लेकर 200 मिलीग्राम पानी में उबालकर जब आधा रह जाए तो उतारकर छान करपी ले और एक दो बार लेने से बहुत लाभ होगा

स्वरभेद में :- अजमोदा, हल्दी, आंवला, यवक्षार तथा चित्रक को बराबर मात्रा में मिला कर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2-3 ग्राम मात्रा दिन में तीन बार मधु तथा घी के साथ चाटने से स्वरभेद यानी गले की खराश दूर होती है।
चित्रक और आंवला के काढ़ा में पकाए घी का सेवन करने से गले की खराश में लाभ होता है।

गण्डमाला (गले की गाँठे) में :-भिलावा, कासीस, चित्रक तथा दन्तीमूल के बराबर मात्रा के चूर्ण में गुड़ और स्नुही यानी थेहुर पौधे के दूध तथा आक का दूध मिला लें। इसका लेप करने से गले की गांठे ठीक हो जाती हैं।

पाचनतंत्र विकार में :- सैन्धव लवण, हरड़, पिप्पली तथा चित्रक चूर्ण को बराबर मात्रा में मिला कर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 1-2 ग्राम गर्म जल के साथ सेवन करने से भूख लगती है।
चित्रक, वायविडंग तथा

  • नागरमोथा का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह और शाम भोजन से पूर्व सेवन करने से भोजन में अरुचि, भूख की कमी तथा अपच की समस्या ठीक होती है।

कब्ज में :- चित्रक का काढ़ा घी में पकाए और उसके पेस्ट को 5-10 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम खाने के बाद लें। इससे कब्ज ठीक होता है।

बवासीर के रोग में :- चित्रक के जड़ की छाल के 2-3 ग्राम चूर्ण को भोजन से पहले छाछ के साथ सुबह और शाम पीने से बवासीर में लाभ होता है।

  • चित्रक की जड़ को पीसकर मिट्टी के बरतन में लेप कर लें। इसमें दही जमा लें। इसी बर्तन में उस छाछ को पीने से बवासीर में लाभ होता है।

तिल्ली की सूजन में :- ग्वारपाठा / एलोवेरा के 10-20 ग्राम गूदे पर चित्रक की छाल के 1-2 ग्राम चूर्ण को लगाकर खाने से तिल्ली की सूजन ठीक होती है।

प्रसव में :- चित्रक की जड़ के 5-10 ग्राम चूर्ण में दो चम्मच मधु मिलाकर महिला को चटाने से प्रसव सामान्य और सुख पूर्वक होता है।

गठिया में :- चित्रक की जड़, इन्द्रजौ, कुटकी, अतीस और हरड़ को समान भाग में लेकर चूर्ण बना लें। इसे 3-5 ग्राम मात्रा में सुबह और शाम सेवन करने से वात के कारण होने वाली समस्याएं ठीक होती हैं।

  • चित्रक की जड़, आंवला, हरड़, पीपल, रेवंद चीनी और सेंधा नमक को बराबर भाग लेकर चूर्ण बनाकर रखें। 4-5 ग्राम चूर्ण को सोते समय गर्म पानी के साथ सेवन करने से जोड़ों का दर्द, वायु के रोग और आंतों के रोग मिटते हैं।
  • लाल चित्रक की जड़ की छाल को तेल में पकाकर, छानकर लगाने से पक्षाघात यानी लकवा और गठिया में लाभ होता है।

चर्म रोगों में :- चित्रक की छाल को दूध या जल के साथ पीसकर कुष्ठ और त्वचा के दूसरे प्रकार के रोगों में लेप करने से आराम मिलता है। इन्हीं चीजों को एक साथ पीसकर पुल्टिस (पट्टी) बनाकर बाँध दें। छाला उठने तक बाँधे रखें। इस छाले के आराम होने पर सफेद कुष्ठ के दाग मिट जाते हैं

  • लाल चित्रक की जड़ को पीसकर, तेल के साथ मिलाकर पकाकर, छानकर लगाने से सूजन, कुष्ठ, दाद, खुजली आदि त्वचा की बीमारियों में लाभ होता है।
  • लाल चित्रक की जड़ को पीसकर लगाने से मण्डल कुष्ठ में लाभ होता है।
  • 1-2 ग्राम लाल चित्रक की जड़ के चूर्ण का सेवन करने से कुष्ठ में लाभ होता है।

हिस्टीरिया रोग में :- चित्रक की जड़, ब्राह्मी और वच का बराबर की मात्रा में चूर्ण बनाकर 1 से 2 ग्राम तक की मात्रा में दिन में तीन बार गाय के दूध के साथ देने से हिस्टीरिया (योषापस्मार) में लाभ होता है।

बुखार में :- चित्रक की जड़ के चूर्ण, सोंठ, काली मिर्च तथा पिप्पली का चूर्ण 2-5 ग्राम की मात्रा में देने से बुखार ठीक होती है।

  • बुखार में जब रोगी खाना नहीं खा सके तब उसे चित्रक की जड़ के टुकड़ों को चबाने के लिए दे अच्छा लाभ होगा।
  • अकेले चित्रक की जड़ के चूर्ण को दिन में तीन बार सेवन करने से से बुखार कम हो जाता है।
  • प्रसूति को बुखार आने पर चित्रक की जड़ के चूर्ण को निर्गुंडी के 10-20 मिली रस के साथ देना चाहिए।

हाथीपांव रोग पर:-लाल चित्रक तथा देवदारु को गोमूत्र के साथ पीसकर लेप करने से फाइलेरिया या हाथीपाँव (श्लीपद) में काफी लाभ होता है।

सावधानी :

अत्यधिक गर्म होने के कारण चित्रक का प्रयोग अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।
लाल चित्रक गर्भ को गिराने वाला होता है इसलिए इसका प्रयोग गर्भवती स्त्रियों को नहीं करना चाहिए।
इसका अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से पक्षाघात यानी लकवा  भी हो सकती है। अगर आप किसी बीमारी के इलाज के लिए चित्रक का उपयोग कर रहे हैं तो आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह ज़रूर लें। 

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